शुक्रवार, 19 जून 2026

बड़ा बेटा होना आसान नहीं 😱बचपन से शुरू होती है परीक्षा

                               बड़ा बेटा
घर का बड़ा बेटा या भाई शुरू से मां बाप का आँखो का तारा होता है। फिर वही बेटा आगे दुश्मन कैसे बन जाता है घर का बड़ा बेटा बाद में घर में सबसे ज्यादा क्यों ठगा जाता है
जब शुरू में जिंदगी की शुरुआत हुई सिर्फ पति पत्नी कुछ दिन सबकुछ सामान्य रहा।हंसी खुशी का माहौल।फिर कुछ दिन बाद घर में खुशखबरी आई। मां बनने की।घर का माहौल उत्साहित हो गया।दादा दादी या नाना नानी दोनों मिलकर नए मेहमान के स्वागत में उत्साहित रहते हैं।घर का पहला बच्चा।।

समय पूरा नए मेहमान आ गए ।बधाई हो लड़का हुआ।मिठाई बांटी जाने लगी।ये पूरे घर का केंद्र है। घर का पहला बच्चा बेटा। समारोह/पूजा/भोज सभी अपने अनुकूल समारोह करते हैं। ये बच्चा किसी को माँ ,मौसी, फुआ, नानी,दादी,चाची तो किसी को पापा,चाचा,मौसा,मामा,दादा,दादी,नाना,फूफा की उपाधि दे दिया।चुकी घर में पहला बच्चा है सभी के शौक अरमान  जुड़े है।सभी का प्यारा है।
कुछ समय सब ठीक चलता है। बच्चे बड़े होते हैं बड़े का प्यार आशीर्वाद मिलता है।कुछ दिन बाद अचानक पता चला फिर से दूसरे मेहमान आने वाले हैं।
खुशी होती है पर पहली खुशी पहला अनुभव वाली बात नहीं होती। ये सामान्य व्यवहार है। दूसरे मेहमान भी बेटा ही आए।
पहले बड़े बेटे की उम्र 10वर्ष हो गई। छोटा अभी छोटा है।
फिर भी बचपन में मां बाप ने क्षमता अनुसार प्यार बराबर दिया। कुछ भी खाना ,कपड़ा,खिलौना दोनों को दिलवाया गया। साइकिल पर दोनों को घुमाया गया।समय के साथ बड़े बेटे ने जिम्मेदारी संभाली/
बड़े बेटे ने मां पिताजी के परेशानी कष्ट को देखा ।थोड़ा बहुत जिम्मेदारी उठाएं। बड़े ने कुछ मांगा उसे समझाया गया।मजबूरी बताई गई।उसके खुद भी अनुभव किया। क्योंकि बड़े बेटे ने मां के त्याग ओर पिता की मेहनत और बच्चों के लिए अपनी खुशी अरमान को त्यागते मां बाप को देखा होता है।
इसलिए अक्सर लगभग हर घर का बड़ा बेटा जिद्दी, बदमाश,खर्चीला नहीं होता है।(ऐसे दुनिया में अपवाद की कमी नहीं है)
घर का बड़ा बेटा: बचपन से ही जिम्मेदारियों का सफर
घर का बड़ा बेटा अक्सर बचपन से ही परिवार की उम्मीदों का केंद्र बन जाता है। जब वह छोटा बच्चा होता है, तब भी उससे समझदारी, जिम्मेदारी और त्याग की उम्मीद की जाने लगती है।फिर
बचपन में वह भी खिलौनों, खेल और शरारतों में खोना चाहता है, लेकिन धीरे-धीरे उसे सिखाया जाता है कि छोटे भाई-बहनों का ध्यान रखना है, माता-पिता की मदद करनी है और परिवार का सहारा बनना है।
कई बार बड़ा बेटा अपनी छोटी-छोटी इच्छाओं को दबा देता है ताकि घर के दूसरे सदस्यों की जरूरतें पूरी हो सकें। उसकी मुस्कान के पीछे कई अनकही जिम्मेदारियां छिपी होती हैं।
बड़ा बेटा सिर्फ परिवार का सदस्य नहीं होता, वह अक्सर माता-पिता की उम्मीदों, भाई-बहनों के मार्गदर्शन और घर की मजबूती का आधार बन जाता है।
फिर कुछ दिन बाद मा पिता दोनों मिलकर दोनों बच्चे का नाम लिखवाते है।सपने देखते हैं।उनके भविष्य की चिंता करते हैं। आमदनी कम होने से मध्यम वर्ग के परिवार में सीमित खर्च और आमदनी होती है। जिम्मेदारी बड़ी होती हैं। जिसे बड़ा बेटा नज़दीक से महसूस करता है देखता है।की कितनी जद्दोजहद परेशानी  के बाद मा पिताजी जरूरी चीजें पूरी करते हैं। उन्हें बच्चों के भविष्य के लिए भी कुछ करना है।
देखते देखते एक seven ओर एक three वर्ग में चला जाता है।घर खर्च बढ़ता है।आमदनी सीमित है। और अब यही से शुरू होती है बड़े बेटे की अग्निपरीक्षा।बड़ा बेटा वरदान या अभीशाप। आखिर क्यों परिवार में सबसे ज्यादा बड़ा बेटा ठगा जाता है।।जानने के लिए पढ़े बड़ा बेटा part 2
पिताजी नौकरी में हैं।स्कूल फीस, घर खर्च, रूमरेंट, दूध, डाक्टर खर्च पर्व, त्यौहार,नेवता सबकुछ एक ही पर आश्रित। सबकुछ उन्हें ही पूरा करना है।
डिस्क्लेमर - डिस्क्लेमर:
इस ब्लॉग में दी गई सभी जानकारी एवं विचार मेरे व्यक्तिगत अनुभव और समझ पर आधारित हैं। इसका उद्देश्य केवल अपने अनुभवों को साझा करना है। अलग-अलग स्थान, परिस्थितियों और लोगों के अनुभवों में भिन्नता हो सकती है। कृपया इसे किसी व्यक्ति, स्थान या घटना से जोड़कर न देखा जाए। यह केवल मेरी व्यक्तिगत अभिव्यक्ति है, जिसका उद्देश्य किसी की भावना को ठेस पहुँचाना या किसी प्रकार का दावा करना नहीं है


मंगलवार, 6 जनवरी 2026

अरावली पर्वत

Aravali Hills view for nature and travel blog                         🌍अरावली पर्वत 🌎
अरावली पर्वत भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है। यह पर्वतमाला उत्तर-पश्चिम भारत में फैली हुई है और देश की भौगोलिक संरचना में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। भूवैज्ञानिकों के अनुसार अरावली पर्वत लगभग 250 करोड़ वर्ष पुराने हैं, जो इन्हें विश्व की सबसे पुरानी पर्वत प्रणालियों में शामिल करता है।

विस्तार और स्थिति

अरावली पर्वत श्रृंखला का विस्तार गुजरात से शुरू होकर राजस्थान होते हुए हरियाणा और दिल्ली तक लगभग 800 किलोमीटर की लंबाई में फैला है। यह पर्वतमाला राजस्थान को दो भागों में बाँटती है—पूर्वी उपजाऊ क्षेत्र और पश्चिमी शुष्क मरुस्थलीय क्षेत्र।

प्रमुख शिखर
अरावली पर्वत का सर्वोच्च शिखर गुरु शिखर है, जो राजस्थान के माउंट आबू क्षेत्र में स्थित है। इसकी ऊँचाई लगभग 1722 मीटर है। माउंट आबू अरावली पर्वत का एकमात्र हिल स्टेशन भी है।
भौगोलिक और पर्यावरणीय महत्व

अरावली पर्वत थार मरुस्थल के फैलाव को रोकने में सहायक है। यह पश्चिमी भारत की जलवायु को संतुलित करता है और वर्षा के जल को रोककर भूजल स्तर बनाए रखने में मदद करता है। इस पर्वतमाला से कई नदियों का उद्गम होता है, जिनमें लूणी, बनास और साबरमती की सहायक नदियाँ प्रमुख हैं।

ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व

अरावली क्षेत्र ऐतिहासिक दृष्टि से भी अत्यंत समृद्ध रहा है। यहाँ अनेक प्राचीन किले, राजपूत स्थापत्य और धार्मिक स्थल स्थित हैं। कुंभलगढ़, रणथंभौर, अचलगढ़ जैसे प्रसिद्ध किले और दिलवाड़ा जैन मंदिर इस क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को दर्शाते हैं।

जैव विविधता

अरावली पर्वत क्षेत्र में शुष्क पर्णपाती वन पाए जाते हैं। यहाँ तेंदुआ, सियार, नीलगाय, लोमड़ी तथा अनेक पक्षी प्रजातियाँ निवास करती हैं। यह क्षेत्र वन्यजीव संरक्षण की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।
अरावली पर्वत की कुछ खास और महत्वपूर्ण जानकारियाँ

दुनिया की सबसे पुरानी पर्वतमालाओं में एक

अरावली पर्वत श्रृंखला की आयु लगभग 250 करोड़ वर्ष मानी जाती है। यह हिमालय से भी कहीं अधिक प्राचीन है। समय के साथ अपरदन (erosion) के कारण इसकी ऊँचाई कम हो गई है।
विश्व की प्राचीनतम चट्टानों में शामिल

अरावली में पाई जाने वाली चट्टानें आर्कियन और प्रोटेरोज़ोइक युग की हैं। यहाँ की चट्टानों में पृथ्वी के प्रारंभिक इतिहास के प्रमाण मिलते हैं।
सभ्यता के विकास में भूमिका

अरावली क्षेत्र में हड़प्पा सभ्यता से भी पहले मानव बसावट के प्रमाण मिले हैं। यह क्षेत्र प्राचीन व्यापार मार्गों का हिस्सा रहा है।

 माउंट आबू – एकमात्र हिल स्टेशन

अरावली पर्वत में स्थित माउंट आबू राजस्थान का एकमात्र पर्वतीय पर्यटन स्थल है। यहाँ की जलवायु शेष राजस्थान से काफी अलग और ठंडी रहती है।
Disclaimer:--
यह वीडियो/पोस्ट/कंटेंट केवल सामान्य जानकारी और शैक्षणिक उद्देश्य से बनाया गया है। इसमें दी गई जानकारी विभिन्न पुस्तकों, इंटरनेट स्रोतों और सामान्य ज्ञान पर आधारित है। किसी भी प्रकार की त्रुटि के लिए कंटेंट क्रिएटर जिम्मेदार नहीं होगा। कृपया इसे आधिकारिक या कानूनी सलाह न समझें।



सोमवार, 13 अक्टूबर 2025

गांव की 🪔🎇 दिवाली

मैं एक मध्यम परिवार से हूं। शुरुआती जीवन ग्रामीण और संयुक्त परिवार में हुआ था। ग्रामीण माहौल ग्रामीण मौसम के साथ पल बढ़ कर आज शहरी जीवन व्यतीत कर रहा हूं।आज भी वो समय याद करके मन प्रफुल्लित हो जाता है।कितना अच्छा शुकून भरी शांति पूर्ण जिन्दगी थी।
दादा,दादी, चाची चाचा, फुआ, नाना,नानी , मौशी के बीच रहकर गुजरी जिंदगी।
दुर्गा पूजा के बाद दिवाली की आगाज
जब मैं बच्चा था और दिवाली का समय दुर्गा पूजा के बाद ही आ जाता था। उस समय तारीख से नहीं कैलेंडर से नहीं दुर्गापूजा के पंद्रह दिन बाद दिवाली और छह दिन बाद छठ पूजा होता था। और ये अनुमान बिलकुल सटीक था। बचपन का अनुमान।
दुर्गा पूजा जब होता उसके बाद गांव घर में उस समय ज्यादातर लोग कच्चे मकान में रहते थे या सभी घर में लगभग कच्चे मिट्टी से लेप लगाने लायक जगह तो होता ही था।किसी का दिवाल कच्ची है तो किसी का आंगन तो किसी का द्वार या दरवाज़ा।जिसकी जितनी हैसियत वो उस हिसाब से घर द्वार रंग पुताई करवाता था।
दिवाली की तैयारी
सबसे मजेदार बात आज भी गजब का एहसास देती हैं कि हम उस समय तकरीबन आठ या दस वर्ष के होंगे। गांव से दूर एक तालाब हुआ करती थीं उसके बांध के पास जाके मिट्टी की खुदाई करके बोरा,झोला,daliya, बाल्टी, टोकरी वगैरह में भरकर घर के आगे लाकर जमा किया जाता था।मिट्टी पीला या लाल होता था।मिट्टी खोदना भरना सर पर उठाकर लाना।ये काम जोरो से लगभग सभी ग्रामीण घरों में होती थी। छोटे छोटे बच्चे लड़कियां औरत मर्द सभी मिल कर मिट्टी ढुलाई का काम करते थे।पूरा माहौल मिट्टी की सोंधी सोंधी खुशबू से सराबोर हो जाता था।हंसी मजाक भी होती थीं। कई घरों के बच्चे लड़कियां एक साथ जाती थी।घर में निपाई पुताई साफ सफाई मुख्य रूप से घर की औरते करती थीं। पूरे घर की साफ सफाई होती थीं। कोई घर के आंगन तो कोई घर की दीवार तो कोई दरवाज़ा की निपाई पुताई कर रही है। साड़ी पहने हुई कमर में लपेटकर आंचल बंधे हुए सर पे भी आंचल। अपने काम में व्यस्त।ये नजारा ओर तैयारी देख कर दिवाली आने वाली है ऐसा महसूस हो जाता था।
ग्रामीण परिवेश
उस समय गांव में एक कुएं हुआ करती थीं जिसके पानी से खाना अच्छा टेस्टी बनती थी पूरा गांव की महिलाओं का झुंड उस कुएं पर सुबह से शाम तक जाना आना लगा रहता था।
तालाब में sanathi जिससे हुक्का पाती खेला जाता था उसे नदी से निकालकर उसके छाल को छुड़ाया जाता था नीचे उजला हल्का sanathi दिखती थीं जिसे बांधकर बाजार में ले जाकर बेचा जाता था। दिवाली के लिए मिट्टी की दिया बनाते कुम्हार की चक्की। घरौंदा या घरकुंडा बनाते बच्चे।
दीपक ,तेल,पटाखा खरीदकर लाते घर के पुरुष। ये नजारा देख कर दिवाली आ गया पता चल जाता था।
दिवाली के दिन की तैयारी 
दिवाली आई सुबह से घर के सभी लोग अपने अपने काम में व्यस्त।शाम हुई मिट्टी की कूपी में बत्ती लगाके मिट्टी तेल भरती घर की बुजुर्ग महिला।पूजा पाठ की तैयारी करते पुरुष।घर को सजाते बच्चे लड़कियां औरत मर्द सभी।
घरकुंडा या घरौंदा में मिट्टी के बर्तन में लावा/ मुड़ी/खिलौना/रख कर दिया जलाने की पारंपरिक तरीका है।
उसके बाद इसी दिन लक्ष्मी गणेश जी की मूर्ति पूजा भी की जाती हैं।
दिवाली की शाम और रात की तैयारी 
शाम हुई सभी छत पर एक दूसरे को देखते कौन पहले छत पर दिया जलाता है।फिर धीरे धीरे सभी छत पर दिए जगमगाने लगे। पटाखा छुटने लगे। नए नए कपड़े पहन कर दिवाली मनाते सभी लोग।
फिर थोड़ी रात हुए सभी हुक्का पाती खेलने के लिए एक दूसरे घर के लोगों से बोलते ।सभी मिलकर हुक्का पाती अपने अपने घर से निकालते हुए।एक जगह एकत्रित हुए एक दूसरे को बधाई दी।फिर सभी एक दूसरे के घर आना जाना शुरू आशीर्वाद लेने बड़े बुजुर्ग से। आशीर्वाद के रूप में मिठाई खिलौना जो चीनी का बना होता है उसे खाने का प्रचलन है। मुख्य रूप से।
फिर चावल दाल कचरी दहीबड़ा तरह तरह के पकवान खाते हैं सभी।
हम जाकर देखते है कि मेरे छत पर दीपक ज्यादा देर तक चले जले।
ऐसे होती हैं गांव की दिवाली।आप सभी को आने वाली दिवाली की हार्दिक बधाई।
Disclaimer - उपरोक्त ब्लॉग कंटेंट मेरा व्यक्तिगत अनुभव है। रीति रिवाज तौर तरीके में अंतर हो सकता हैं। किसी भी लिखावट में हुई भूल के लिए क्षमा प्रार्थी हूं,,

represented by qrb

बड़ा बेटा होना आसान नहीं 😱बचपन से शुरू होती है परीक्षा

                                बड़ा बेटा घर का बड़ा बेटा या भाई शुरू से मां बाप का आँखो का तारा होता है। फिर वही बेटा आगे दुश्मन कैसे बन जा...