मंगलवार, 30 जून 2026

जब नींद और दर्द हार गई जिम्मेदारी जीत गई

अभी रात के एक बज रहे हैं। मैं भागलपुर स्थित अपने घर के रूम में सो रहा था।एक सेलिंग दूसरा स्टैंड फैन चल रहा था।नींद बहुत अच्छी लग रही थी। कल 30 जून था अभी 1 जुलाई हो गया है।जाने कहां गए वो दिन
क्योंकि जीना इसी का नाम है
की अचानक मेरे दाहिने पैर की सबसे छोटी उंगली में कुछ चुभन वाला दर्द हुआ।नींद गहरा था लेकिन दर्द हुआ उठा मोबाइल जलाकर लाइट से पैर देखा तो छोटी उंगली से खून निकल रहा था।पता नहीं क्या था क्या काटा।हमने उसी समय 
काफी खोज बीन की आखिर क्या काटा पर कुछ मिला नहीं।
इसी खोजबीन के क्रम मे मम्मी ने पूछा क्या हुआ हमने बोला लगता है कुछ काट लिया । पता नहीं क्या था।फिर हमने उनको जख्म दिखाया।savlon से साफ किया। कटा हुआ भाग मम्मी को दिखाया। मन में डर लग रहा था पता नहीं क्या था।थोड़ा थोड़ा चुभन वाला दर्द था।
फिर सोनी और मीठी को उठाया।मीठी थोड़ी चिंतित हुई।सोनी भी हालचाल पूछी।
रात के अभी दो बज रहे हैं बीच बीच मे मम्मी ,सोनी ,मीठी पूछ रही है कोई दिक्कत तो नहीं।सोना नहीं है।पानी नहीं पीना है।
अब हम क्या करे असमंजस में हूं क्या काटा पता नहीं।दर्द है जलन है चुभन है समझ नहीं पा रहा। मन में शंका है।नींद आ रही थी।अभी भी आ रही है पर डर के ओर शंका के कारण ठीक से सो नहीं रहा जागते रहो वाली स्थिति है।अब रात है तो नींद आना लाजिमी है।प्यास पहले से लगी है पर पानी से डर लग रहा है।
सभी सो रहे हैं बीच बीच में आके खैरियत पूछ लेते हैं।हम भी शंकित है। चिंतित हैं।
अब हम सोच रहे हैं कि अगर कुछ हुआ तो घर परिवार कैसे रहेंगे।इनका क्या होगा।खासकर मीठी से विशेष लगाव है उसका क्या होगा। जिम्मेदारी है उम्मीद है।पर भरोसा है कि मां है सब संभाल लेगी।पर मा की भी उम्र हो चुकी हैं। जिम्मेदारी बड़ी है।मतलब अपना नहीं अपने परिवार घर जिम्मेदारी की चिंता सता रही है।इसके आगे अपना दर्द कुछ नहीं है।घर परिवार खुश रहे साथ रहे थोड़ी कम थोड़ी गरीबी भी चलेगी।
यही है लड़के का परिभाषा।नींद बहुत आ रही है रात है हवा चल रही है पर डर शंका सोने नहीं दे रही।
फिर सोचता हूं कल एक ratbook लाया था।क्योंकि चूहा बहुत दिनों से तंग परेशान कर रहा था। चूहे से हमने आग्रह किया बोला कि रहो घर है खाओ पियो पर चीजें मत काटो गंदा मत करो।अजीज होके किताब लाया।दूसरी रात घर में लगाया चूहा जो कई दिनों से परेशान था कर रहा था ।वो बुक में आके सट गया ।सुबह उसे बाहर निकल फेंका मारा नहीं।अब ये लग रहा है कि उस चूहे की पत्नी या उस चूहे का पति ने हमसे बदला लिया।
डर से रूम की लाइट जलाए रखा पता नहीं दोबारा न आके काट ले।
फिर मन सोच रहा है कि कोई ग्रह या घटना घटित होती शायद थोड़ा बहुत होकर वो टल गया 
"यह डर से ज्यादा जिम्मेदारी का एहसास है।"
एक छोटी सी चोट ने मन को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि मेरी जिंदगी सिर्फ मेरी नहीं है, मेरे साथ कई लोगों की उम्मीदें जुड़ी हैं। शरीर थका है, आंखों में नींद है, प्यास लगी है, दर्द भी बहुत बड़ा नहीं है… लेकिन दिमाग अनजाने डर और परिवार की चिंता में जाग रहा है।
इसे मनोविज्ञान की भाषा में "अनिश्चितता से पैदा हुई चिंता (Anxiety due to uncertainty)" कह सकते हैं। जब कारण पता नहीं होता — जैसे क्या काटा, आगे क्या होगा — तो दिमाग संभावित खतरों को सोचने लगता है। और जब इंसान जिम्मेदारियों से जुड़ा होता है, तो यह चिंता अपने से ज्यादा अपनों के लिए होने लगती है।
एक लाइन में कहें तो:
"ये दर्द की नहीं, जिम्मेदारी की रात थी… शरीर सोना चाहता था, लेकिन मन अपनों की चिंता में जाग रहा था।"
डिस्क्लेमर --डिस्क्लेमर:
यह लेख किसी चिकित्सा सलाह, डर फैलाने या किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के उद्देश्य से नहीं लिखा गया है। इसमें केवल एक व्यक्तिगत अनुभव और उस समय मन में आए विचारों व भावनाओं को साझा किया गया है। किसी भी चोट, काटने या स्वास्थ्य संबंधी समस्या में सही जानकारी और उचित सलाह के लिए डॉक्टर से संपर्क करना बेहतर है।

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