गुरुवार, 25 जून 2026

नानी घर का आंगन पार्ट 1

वक्त बदल जाता है, चेहरे बदल जाते हैं, लेकिन परिवार के साथ बिताए पल हमेशा दिल में जिंदा रहते हैं। ❤️ पुरानी तस्वीरें सिर्फ यादें नहीं होतीं, ये हमारे रिश्तों की कहानी होती हैं।"

मैं एक मिडिल क्लास फैमिली से ताल्लुक रखता हूं। मैं घर का बड़ा बेटा, बड़ा नाती,बड़ा पोता हूं। बचपन संघर्षमय ही था।बचपन में प्रारंभिक शिक्षा नानीघर में ही हुआ। बचपन आदरणीय नानी के आँचल तले बीता।मामा मामी मौसी सभी का प्यार भरपूर मिला। दादीघर से ज्यादा नानीघर से जुड़ाव रहा। भले ही आज कोई कुछ भी बोले।
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नाना एक साधारण कर्मचारी थे राजस्व विभाग में।परिवार लंबा था।गरीबी संघर्ष में जिंदगी बीत रही थी फिर भी उसमें भी अपना अलग प्यार था । अपनापन था। उस समय पांच दस पैसा चलता था।
मेरा नामांकन गांव के एक प्रारंभिक स्कूल में नानी की कोशिश और सभी लोगों के साथ से सरस्वती पूजा के दिन करवाया गया
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नानी घर का वो संडे का सुबह जब मामा साइकिल से बासा पर जाते थे तो हमें साइकिल के पीछे बैठा कर ले जाते थे।वो खुद गए के लिए घास जलावन के लिए लकड़ी की व्यवस्था करते ओर हम पास के ही खेत के मेड यानी अड्डा पर बैठकर खेलते थे।
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उस समय वो दौर 1995 का रहा होगा शायद। सिर्फ एक बड़े मामा की शादी हुई थी उस समय।एक मेरी मां और एक मौसी।
हमारी मां और मौसी एक घर में थी उनकी शादी एक ही घर में हुई थी।
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घर की सबसे बड़ी बेटी हमारी मां थी जिनका सिलेक्शन बचपन में ही बालिका विद्यापीठ लखीसराय में हुआ था वो भी खुद की मेहनत से। उस स्कूल में पढ़ना उस समय गर्व की बात हुआ करती थी।चुकी ये बचपन से ही पढ़ने में तेज़ मेहनती थी।
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नानीघर के गाँव की कच्ची सड़क कच्ची गलिया और वो बचपन के दोस्त। नानी के आँचल से एक रुपया चुराना और दुकान चले जाना। दिनभर गुल्ली डंडा, दौड़ भाग न खाने की चिंता न घर जाने की । अपने धुन मे मस्त।कभी नानी खोज रही है तो कभी मौसी।चुकी मैं स्कूल नहीं जाना चाहता था। मुझे खोजकर नहलाकर जबरदस्ती स्कूल भेजना।
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जब मां पिताजी मुझे पहाड़पुर लेने आते या भागलपुर ले जाने आते।तो इनलोगों को देखते ही मैं गांव में भाग जाता और जब तक ये नहीं जाते तब तक हम घर नहीं आते।एक बार तो हद हो गई मा पिताजी लेने गये मुझे भागने का समय नहीं मिला बस हम अचानक घर में रखे पलंग के अंदर घुस गया। और संयोग उसी रूम में मां पिताजी आके बैठ गए।बात चीत करने लगे।उस दिन बिना खाए पीए आठ घंटे बिताना पड़ा था हमें।
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नानी घर में टाटिया की दीवार फूस की छत लेकिन मौसी लोगों ने इसको सजाने में कोई कमी नहीं छोड़ी थी।इसके सामने बड़े बड़े बंगले फीके थे।साफ सफाई भी ग़ज़ब की थी।
उसी गांव के कच्ची सड़क पर खेलते हुए मेरे सर फूट गया था जिसका निशान अभी तक है।पत्थर ओर मोरंग का सड़क था।
नानीघर का हर घर हर गली हर व्यक्ति मुझे जानता था।बिना संकोच रोक टोक मेरी एंट्री होती थी।मानो ऑल Village ऑल हाउस परमिट प्राप्त हो मुझे।
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उस समय नानीघर के गाँव की लड़कियां ओर लड़के पास के ही स्कूल में पढ़ने जाया करती थी।
होली में रंग पिचकारी और सांडों गंजी हाफ पैंट मुझे दिलवाया जाता था।पकवान पुआ मिठाई मटन बनता था। चूल्हे पर लकड़ी से।बहुत स्वादिष्ट।
नानी घर में कालीपूजा का विशेष रूप से मनाया जाता था। गांव के ही नवयुवक संघ के नौजवान नाटक खेलते थे।रात्रि तीन बजे तक लगातार दर्शक की भीड़ लगी रहती थी।जिसमें छोटे मामा का किरदार पॉपुलर हुआ करता था।कभी अक्षय तो का ही गोविंदा के रोल में। वो झालमुड़ी की दुकान,वो मिठाई की दुकान, उस समय दस पांच रुपया में ही मेरे लिए काफी था।
(ऐसे नाटक मंच के सुपरस्टार मेरे पूज्यनीय पिताजी भी हुआ करते थे) चुकी दोनों मामू काफी हैंडसम स्मार्ट थे।मौसी मालोग भी सुंदर थी। व्यावहारिक भी।
इनलोगों का स्टेज पर जाना ओर तालिया की गड़ गड़ाहट। रंगारंग कार्यक्रम।
नानी घर में खाना बनाने के लिए एक विशेष कुआं का पानी आता था।प्रताप सिंह का दरवाजे पर वो कुँए थे। गांव की लड़कियां ओर महिलाओं का वहां जमावड़ा लग जाता था।
सभी भाई बहनों में प्यार लगाओ अपनापन था।क्योंक ऑल इन ऑल नानी थी। पूरे परिवार की जिम्मेदारी आदरणीय नानी की थी।उतना बड़ा परिवार को संभाल कर रखना वाकई गजब का पावर ओर समझ शक्ति थी।अभी लोग अपने छोटे परिवार को नहीं संभाल पा रहे। हर मौका मुश्किल में भाई बहन का साथ देते थे। लेकिन ये नानी और नाना के समय की बात थी।
नानीघर में लगभग 8साल रहा।लगातार। लेकिन जितना प्यार अपनापन मिला वो शायद ही किसी मौसी या मामा ने अपने खुद के संतान को दिया हो। भले ही आज कोई जबरदस्ती सटकर उखली पर चढ़कर हमसे बराबरी करे। पर मेरी बात को सत्यापित खुद नानीघर के लगभग सभी घर के लोग कर देंगे।
शायद वही अच्छे दिन थे। हमने जिया एहसास किया साथ रहे । हमें गर्व है।
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हमें वो रात याद है जब छठ वाकई रात थी उस समय cd/dvde /vcr/ का समय था।सभी लोग जुटे थे बागवान फिल्म चल रहा था और किसी सीन पर नाना या नानी किसी को रोना आ गया।पूरा माहौल इमोशनल।जब छठ नानी करती थी तो सारे लोग जुट जाते थे उत्साहित माहौल रहता था।सारा खर्च नानी का होता था।कोई लोग उस समय डायरी कलम साथ नहीं रखता था।हिसाब और गणित इतना तगड़ा नहीं था। फिर भी नाना नानी के सभी बच्चे सेटल है।
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कुछ दिन बाद हम हमेशा के लिए नानीघर को अलविदा कह दिए।हमें मा पिताजी के पास भागलपुर पढ़ने भेज दिया गया। पर मेरा मन वहां नहीं लग रहा था।जिस्म भागलपुर में जान गलिमपुर में।शायद नानी ओर मौशी लोगो को भी मेरी कमी खल रही थी।मेरे कारण उनलोगों का भी मन लगा रहता क्योंकि मैं बचपन में बहुत शरारत करता था।
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समय बीता 2003 आ गया नाना श्री रिटायर्ड होके घर आ गए। तबतक कई मौसी मामा की शादी हो गई थी सब अपने अपने घर चल गए। यही से शुरू हुआ u टर्न जबरदस्त बदलाव। इस समय तक काफी कुछ बदल चुका था। आगे पार्ट 2जल्द आयेगा
Disclaimer:
"यह मेरे निजी अनुभव और विचार हैं, किसी व्यक्ति या संस्था के प्रति कोई आरोप या नकारात्मक भावना व्यक्त करना उद्देश्य नहीं है।"

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