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शनिवार, 7 दिसंबर 2024

LIFE INSURANCE CORPORATION

LIC" का पूरा नाम "Life Insurance Corporation of India" होता है। यह एक सरकारी जीवन बीमा कंपनी है जो भारत में जीवन बीमा सेवाओं की पेशकश करती है। LIC भारत का सबसे बड़ा जीवन बीमा कंपनी है और उसके पास भारत में लाखों बीमा धारक हैं। LIC विभिन्न जीवन बीमा योजनाओं, जैसे पारंपरिक जीवन बीमा, अक्सीजन सप्लाई बीमा, अक्सीजन सप्लाई बीमा आदि की पेशकश करती है।read must 
👉कन्यादान योजना( Lic)यह योजना 1994 में शुरू हुई थी और इसका मुख्य उद्देश्य लड़कियों के विवाह की आर्थिक बोझ हटाना था।

कन्यादान योजना एक ऐसी योजना है जो लड़की के विवाह के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करती है। इस योजना के तहत, एक छोटी सी बचत खाता खोला जाता है जिसमें परिवार द्वारा एक निश्चित धनराशि नियत की जाती है। यह धनराशि उस समय तक जमा की जाती है जब तक लड़की विवाह के लिए तैयार न हो जाए।

इस योजना के तहत, लड़की के विवाह के समय उसके परिवार को इस खाते से धनराशि निकालने की अनुमति होती है जो उसकी शादी के खर्चों के लिए इस्तेमाल की जाती है। इसके अलावा, कुछ राज्यों में सरकारी योजनाओं के तहत इसका लाभ देने की भी व्यवस्था होती है।what is website

कन्यादान योजना का उद्देश्य लड़की के विवाह के खर्चों को कम करना होता है और उसे वित्तीय सहायता प्रदान करना होता है ताकि उसके परिवार को उसकी शादी के खर्चों के लिए उठाने वाली अतिरिक्त आर्थिक भार से बचाया जा सके।
Lic कन्यादान योजना के लिए पात्रता--

लिंग:
इस योजना के लिए लड़की का लिंग होना आवश्यक है।

आयु:
योग्यता आयु 18 से 40 वर्ष के बीच होनी चाहिए।

वैवाहिक स्थिति:
योग्यता के लिए, लड़की का वैवाहिक स्थिति विवाहित नहीं होना चाहिए।

आवास:
आवेदक का आवास भारत के किसी भी राज्य में हो सकता है।

आय:
आवेदक और उनके परिवार के सदस्यों की वार्षिक आय योग्यता के अनुसार होनी चाहिए। इसके लिए आय के अनुसार विभिन्न राज्यों में अलग-अलग निर्धारित सीमाएं होती हैं।
👉एलआईसी (LIC) कन्यादान योजना में शुरुआती राशि न्यूनतम रुपये 1,00,000 से होती है। इस योजना में आप एक निशुल्क बीमा राशि चुन सकते हैं जिसे प्रति वर्ष भुगतान किया जाता है जिससे योजना की धनराशि का आकलन किया जाता है।
👉LIC कन्यादान योजना: 

LIC कन्यादान योजना में आप निर्धारित अवधि के लिए न्यूनतम वार्षिक प्रीमियम भुगतान करने की आवश्यकता होती है। यह प्रीमियम योजना की धनराशि और आपकी आयु के आधार पर निर्धारित किया जाता है।

यदि आप लगातार 18 वर्षों तक 14 साल तक योजना खरीदते हैं, तो आपको न्यूनतम वार्षिक प्रीमियम भुगतान करने की आवश्यकता होगी। इस स्थिति में, न्यूनतम वार्षिक प्रीमियम 1,000 रुपये होगा।

लेकिन, यदि आप एक आकर्षक कन्यादान योजना चुनते हैं जिसमें अधिक धनराशि होती है तो आपको उसके अनुसार अधिक प्रीमियम भुगतान करना होगा। इसलिए, अधिक जानकारी के लिए आप LIC शाखा से संपर्क कर सकते हैं और अपनी आयु और योजना की धनराशि के अनुसार निर्धारित प्रीमियम जान सकते हैं।
Lic कन्यादान योजना के फायदे--

एलआईसी कन्यादान योजना भारत सरकार द्वारा चलाई जा रही एक सुविधा है जिसमें लड़की की शादी में वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। यह योजना उन लोगों के लिए है जो अपनी बेटियों को शादी के लिए तैयार कर रहे हैं। कुछ इस योजना के फायदे निम्नलिखित हैं:

👉आर्थिक सहायता: इस योजना के अंतर्गत, शादी के लिए आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है। इससे बेटी की शादी के खर्चों में कमी आती है और परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार होता है।

👉समाज में स्थान: बेटी की शादी में वित्तीय सहायता प्रदान करने से, एक परिवार का समाज में स्थान उन्नत होता है।

👉महिलाओं की आर्थिक स्थिति में सुधार: इस योजना से, महिलाओं की आर्थिक स्थिति में सुधार होता है। बेटियों को शादी के लिए पैसे जोड़ने की आवश्यकता नहीं होती है और उन्हें उनकी जिंदगी के लिए अधिक संसाधन उपलब्ध होते हैं।
Disclaimer--  उपरोक्त Lic संबंधित ब्लॉग विभिन्न क्षेत्रों से संकलित है। विशेष रूप से जानकारी के लिए Lic office के website या संबंधित से सम्पर्क करे। 


शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2022

Happy diwali wishes

               Happy diwali
इस दिवाली घर की सफाई कन्मोरि मेथोड

खुशियों और प्रकाश का पर्व दिवाली इस बार 24 October 2022 को  मनाया जाएगा। कार्तिक मास कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को दिवाली है। धनतेरस से शुरू हुआ ये प्रकाशोत्सव दिवाली भैया दूज के साथ समाप्त हो जाता है। 
कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि-23oct को 6:03 मिनट से शुरू हो के 24oct को 05:7 मिनट तक। 
कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि--24oct को 05:28 से 25oct के शाम 04:18 तक। लक्ष्मी पूजा मुहूर्त-24oct शाम 6:53 मिनट से रात्रि 8:16 मिनट तक। विशेष जानकारी के लिए विशेषज्ञ पंडित जी से सलाह ले।wish you happy diwali

दिवाली क्यों मनाई जाती है--  भगवान श्री राम और लक्ष्मण एवम माता सीता जब बनवास खत्म कर और लंकापति रावण का वध कर अधर्म पर धर्म की विजय स्थापित कर अयोध्या नगरी लौटने की खुशी में दिवाली मनाया गया। दूसरी कथा--जब श्रीकृष्ण ने इसी तिथि को राक्षस नरकासुर का वध किया था। तब द्वारिका नगरी की प्रजा ने दीप प्रज्ज्वलित कर उनको धन्यवाद दिया। तभी से दिवाली मनाया जाने लगा। 

भारतीय संस्कृति में दीपक को सत्य और ज्ञान का प्रतीक माना जाता है। 

दिवाली में साफ- सफाई-- सभी लोग अपने अपने घरों की साफ सफाई करते है क्युकी साफ सफाई मे ईश्वर का वास रहता है। सकारात्मक ऊर्जा घर में आती है। घर के साथ साथ गली मोहल्ला भी साफ किया जाता है। इस बार कोनमेरि मेथोड से साफ सफाई करे। बिल्कुल अलग अनुभव होगा। 

दिवाली की तैयारी- चुकी दिवाली की तैयारी तो पहले से ही हो रहा होता है। लेकिन दिवाली के दिन में खास हो जाती है। मिट्टी के दिये पानी में डुबोया जाता है।पूजा के स्थान से मूर्ति को हटाया जाता हैं। घर में लाइट और बत्ती से सजावट की जाती है। महिलाएं साफ सफाई, खान पान की व्यवस्था करती है। नये कपड़े रखे जाते हैं। मिठाई और पटाखा खरीद कर रखा जाता है। खिलौना चीनी से बनी मिठाई। और धान का लावा। इसका खास महत्व होता है दिवाली में। घरों में रंगाई पोताई होती है। सन् सनठि का भी विशेष महत्व है।  मिट्टी का घरौंदा बनाया जाता है। 

दिवाली की रात्रि में क्या क्या होता है-- दिन भर की तैयारी के साथ शाम मे दीपक और कुप्पी जो मिट्टी तेल, तिल तेल, से भरा रहता है इसको छत पे सजाकर रख दिया जाता है। शाम होते होते सभी लोग स्नान वगैरह करके नये नये कपड़े पहन लेते हैं। सभी मिलकर लक्ष्मी गणेश जी की पूजा अर्चना करते हैं। चढ़ावा मिठाई ,फल  देते हैं। पूजा के स्थान पर घी के दिये दीपक जलाये जाते है। फिर तुलसी पौधा के पास। घर के चौखट पर। उसके बाद छत पर, घर से बाहर दीपक जलाया जाता है। खैर अब तो electrical लाइट बल्ब, झालर जलता है। लेकिन पूजा पारंपरिक तरीका से ही होता है। उसके बाद रंगोली बनाया जाता है। तरह तरह के पकवान बनाये जाते हैं। उसके बाद लगभग 9 बजे के आस- पास हुक्का- पाती खेला जाता है। जिसमे सन सनाथी  को घर के चौखट पर जल रहे दीपक से जला के मन ही मन लक्ष्मी जी का ध्यान करते हुए सभी पुरुष एक साथ निकलते है। चौबटिया पे सभी अपना अपना सनाथी रखते हैं। फिर मोहल्ले के सभी लोग वहाँ एकत्रित होते हैं। आतिशबाजी होती है। उसमे से थोड़ा सा जला हुआ सनाथी घर ले आने की प्रथा है। उसी सनाथी से सुबह- सुबह महिलाएं टूटे सूप पंखा वगैरह को पीटते हुए घर से दरिद्र को बाहर और लक्ष्मी जी को घर में आने की विनती करते हैं। जब हुक्का पाती खेल लिया जाता है तब सभी घर आते हैं और घर की बडी बुजुर्ग महिलाएं थाली में चंदन दही, मिठाई लिए चौखट पे खड़ी रहती है। सभी बारी बारी से प्रणाम करते हैं महिलाएं चंदन लगाके और मिठाई खास तौर पे चीनी से बनी खिलौना और लड्डू देखे आशीर्वाद देती है।घर मे बने छोटे घरौंदे मे मिट्टी की कुलिया मे लावा धान का और चीनी से बने खिलौना रख के पूजा की जाती है और सुबह उसे प्रसाद स्वरूप ग्रहण किया जाता है। उसके बाद मोहल्ला के लोग भी घर घर जाके आशीर्वाद लेते हैं। एक दूसरे को बधाई देते हैं।

उसके बाद सभी एक साथ बैठे हुए खाना खाते हैं। मनोरंजन के रूप में कोओडी या ताश, लुडो, खेलते हैं। घर के सभी लोग एक साथ आतिशबाजी करते हैं। ये हमारी परंपरा है। सब जगह तरह तरह की परंपरा और मान्यता है। 

दिवाली में सावधानी-- सिंथेटिक कपड़े नही पहने। सूती वस्त्र का इस्तेमाल करे। ढीला -ढाला कपड़ा नही पहने जो जमीन को छूती हो। बच्चे को अकेला नही छोड़े। आतिशबाजी देख के करे। घर में पानी से भरी बाल्टी रखे। ज्यादा और तेज आवाज़ के पटाखा का उपयोग खुली जगह पर करे। 

दिवाली से शिक्षा-- अधर्म पर धर्म की विजय। मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के अनुसरण को करना। सेवा का भाव रखना। मर्यादित रहना। लोभ, इर्ष्या, स्वार्थ, को त्याग कर सत्कर्म और धर्म के रास्ते पर चलना। 

दिवाली में खरीददारी-- मिट्टी के दिये और बर्तन ख़रीदे। क्युकी उनके घर भी दिवाली है। आपको धनतेरस  में और फ्रीज, गोड्रेज़, मोटर कार, चांदी सोना खरीदना है। अच्छी बात है लेकिन ठंढ का मौसम आ गया रात को सोना कहाँ है। कुछ ऐसे भी लोग है। जिनकी मदद क्षमता मुताबिक करनी चाहिए। हमे। 

Disclaimer-- उपरोक्त तथ्य सिर्फ विभिन्न माध्यमो से संकलित जानकारी साझा करना है। पुष्टि नहीं। अपना अनुभव आप तक पहुँचा देना है। 


शनिवार, 15 अक्टूबर 2022

🙏महापर्व छठ🙏

          🙏 महापर्व छठ🙏

कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष के षष्ठी तिथि को मनाया जाने वाला महापर्व  छठ पूजा है। ऐसे सीधे तौर पर दिवाली के छः दिन बाद छठ पूजा (महापर्व छठ)होता है। पारिवारिक सुख समृद्धि व मनवांछित फल की प्राप्ति हेतु ये पर्व मनाया जाता है। स्त्री और पुरुष, बूढ़े जवान समान रूप से कर सकते है छठ पर्व। इसमें मुख्य रूप से अस्ताचलगामी सूर्य देव की पूजा उपासना संध्याकाल मे और उदीयमान सूर्य देव की पूजा उपासना प्रातःकालीन मे की जाती है। छठ पूजा बहुत विधि -विधान और श्रधा भाव से की जाती है। कुछ राज्य में इसका खास महत्व है। बिहार, झारखंड, बंगाल, ऐसे नेपाल में भी छठ पर्व होता है। छठ पर्व

दिवाली के बाद छठ घाटो की सफाई 

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दिवाली के बाद से ही छठ पर्व की तैयारी शुरू हो जाती हैं। जिसमे बांस के डाला, टोकरी, सूप ज्यादा प्रचलित है। इसकी खरीददारी की जाती है। उसके बाद छठ व्रत करने वाले लोग के लिए गंगा किनारे या नदी, पोखर के किनारे घाट बनाया जाता हैं। जिससे व्रत करने वाले लोग को पूजा उपासना मे कोई दिक्कत नहीं हो। क्युकी छठ पर्व मे पानी में खड़ा होके सूर्य देव की पूजा उपासना की जाती है। 

गंगा स्नान (नहायखाय) 

इस दिन व्रत करने वाले लोग (छठ पूजा करने वाले महिला/पुरुष) गंगा स्नान करके संकल्प लेते हैं। छठ पर्व करने का। स्नान के बाद गंगाजल घर लाते हैं जो आगे छठ पूजा मे काम आता है। 

कद्दू -भात बनाके खाना

इस दिन बहुत नियम विधान से कद्दू और चने की सब्जी, अरवा चावल का भात, और कई तरह की सब्जी वगैरह साग खाने की प्रथा है। और प्रसाद स्वरूप इससे आस पास पड़ोस में भिजवाया भी जाता हैं। 

खरना 

इस दिन जिसे खरना कहते हैं। इसमें व्रत करने वाले लोग निराहार /उपवास मे रहते हैं। खरना मे गाय के दूध से और अरवा चावल और गुड मिलाकर खीर पुडी बनाये जाते हैं। फिर शाम मे इनसभी को केले के पत्ते पर भोग लगाया जाता हैं। पूजा अर्चना की जाती है। फिर प्रसाद के रूप में इसको वितरित किया जाता है। ये प्रसाद भी घर घर बटवाया जाता है। इस पूजा मे आप अजीब सी शांति का अनुभव करोगे। क्युकी शोर- शराबा वर्जित है। पुरा शहर, गाँव या यू कहे पुरा वातावरण एकदम शांत हो जाता है। इसमें मुख्य रूप से मिट्टी का चूल्हा और आम की लकड़ी का उपयोग काफी महत्व रखता है। ऐसे नये साफ सुथरी चूल्हे पर भी अब बनाने लगे हैं लोग। प्रेम से बोले छठ मैया की जय 🙏

अस्ताचलगामी सूर्यदेव की पूजा सांध्यकालीन अर्घ्य या पहली अर्घ्य

इस वर्ष october month के अंतिम सप्ताह में छठ पर्व मनाया जाएगा। (३० October) |इस दिन षष्ठी तिथि है शाम मे संध्याकालीन पूजा होती हैं। सुबह से काफी चहल पहल रहती है। इसी दिन दिन में डाला, सूप वगैरह तैयार किया जाता है। पकवान,, फल, फूल, पूजन सlमग्री तैयार किया जाता है। शाम तीन बजे के लगभग डाला और व्रत करने वाले लोग अपने अपने घर से छठ घाट की ओर रवाना होने लगते हैं। घर की महिलाएं, बच्चे, बूढ़े सभी टोली बनाकर घाट पहुँच जाते हैं। छठ गीत गाया जाता है। छठ घाट पर छठ व्रत करने वाले लोग गंगा नदी में स्नान के बाद कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य देव की पूजा उपासना करते हैं। 
बारी -बारी से सभी डाला और सूप जो फल, फूल और पूजन सामग्री से सुसज्जित रहता है उसे सूर्य देव को चढ़ाते है। घाट किनारे बैठी महिलाएं छठ पूजा गीत गा रही होती हैं। छठ घाट को पूरी तरह से सजाया जाता है। धूप दीप प्रज्ज्वलित होते रहता है। अगरबती, कपूर , शुद्ध गाय के घी से वातावरण सुगंधित रहता है। पुरा माहौल भक्तिमय रहता है। 
छठ घाट पर बच्चे पटाखे, फुलझडी से आतिशबाजी करते हैं। फिर पुनः वापस घर आते हैं। रात्रि में सबलोग मिलजुल के रहते है। व्रत करने वाले लोग की सेवा की जाती है। वो भी श्रधा भाव से। जो काफी सौभाग्य और पुण्य की बात होती हैं। gets 50% off all items

प्रातः कालीन अर्घ्य दूसरी अर्घ्य

इस दिन उदीयमान सूर्य देव की पूजा आराधना की जाती है। ये अंतिम दिन होता है। पूजा के बाद व्रत करने वाले लोग के लिए अलाव वगैरह की इंतज़ाम किया जाता हैं। पानी से बाहर आने के बाद  इन्हे प्रणाम किया जाता है। जो शुभ फलदायी होता है। चुकी कार्तिक माह में कड़ाके की ठंढ पडती है। उगते सूर्य देव की पूजा के साथ ही लोग अपने अपने घर आते हैं। पहले डाला और सूप का प्रसाद पंडितजी को दिया जाता है। कुछ लोग गाय माता को भी खिलाते है।उसके बाद व्रत करने वाले लोग ग्रहण करती हैं। उसके बाद प्रसाद स्वरूप वितरित किया जाता है। पlरन के साथ ही छठ पूजा समाप्त हो जाता है। व्रत करने वाले लोग पहले हल्का गुनगुना दूध पीते हैं उसके बाद हल्का भोजन लेते हैं। फिर समान्य रूप से खाने पीने लगते हैं। (खुशी

छठ पूजा से जुडी पुरानी यादें😆सफरनामा

बात आज से लगभग बीस वर्ष पहले की है जब हमलोग बच्चे थे। हमारे नानी घर और दादीघर दोनों जगह छठ पूजा होती थी। दोनों जगह संयुक्त परिवार था। घर में फुआजी, पिताजी, चाचा जी, दादी जी एक साथ छठ करती थी। तो दूसरे ओर नानी जी। हमलोग सभी भाई बहन , मौसी, लोग एक साथ मिलते जुलते थे। छठ मे पुरा घर भरा पुरा था। हमलोग सभी छठ पूजा पूरे जोश, भक्ति, श्रधा भाव से मनाते थे। उस समय काफी ज्यादा ठंढ पडती थी। स्वेटर, शाल, टोपी के बाद भी ठंढ लगती थी। शायद वर्ष 1998 ई के आस पास। छठ पूजा में हमलोग सभी परिवार के लोग मामा, मौसा, हम, चचेरे  चचेरि भाई बहन सब पहली अर्घ्य के रात में एक साथ मिल बैठ के बातचीत, हँसी मज़ाक, खाना पीना किया करते थे। बहुत मन लगता था। जाने कहाँ गए वो दिन। 
--उपरोक्त जानकारी अपनी व्यक्तिगत पारिवारिक अनुभव पे आधारित है। तथा कुछ जानकारी अन्य माध्यम से संकलित है। ऐसे सबके अपने -अपने तरीके एवम विधि- विधान होता है। ये भी सच है। फिर भी अगर आप छठ पूजा करने की इच्छुक होते है तो श्रीमान पंडित जी से सलाह लेकर उसका अनुपालन करे। विश्वास है कि पढ़ कर अच्छा लगता होगा। तो please read&forward🙏

represented by qrb

जब नींद और दर्द हार गई जिम्मेदारी जीत गई

अभी रात के एक बज रहे हैं। मैं भागलपुर स्थित अपने घर के रूम में सो रहा था।एक सेलिंग दूसरा स्टैंड फैन चल रहा था।नींद बहुत अच्छी लग रही थी। कल ...