मंगलवार, 18 अक्टूबर 2022

तिलडीहा शक्तिपीठ

                           तिलडीहा शक्तिपीठ               तिलडीहा शक्तिपीठ के रूप में जाना जाता है। यहाँ आराध्य देवी माँ कृष्ण काली भगवती की पूजा होती हैं।विशेष रूप से शारदीय नवरात्र और वासंती नवरात्र में माता के दरबार में लाखों श्रधालु आते हैं। इस शक्तिपीठ के मुख्य पुजारी मेढपति कहलाते है। वर्तमान मे इस शक्तिपीठ के मेढ़पति हरवल्लव दास के वंशज है। यहाँ सप्ताह भर रोज़ श्रधालु आते हैं पूजा पाठ करते हैं। अपनी मुरादे माँगते हैं जो माता के आशीर्वाद से प्राप्त भी होता है। गच्छति कबूल के मुताबिक चढ़ावा चढ़ाते है कोई लड्डू, फल, चुनरी, कुछ लोग पाठा की बलि भी देतेहैं
पूजन विधि तिलडीहा शक्तिपीठ--यहाँ पूजा तांत्रिक और बंगाली विधि से होता है। यहाँ की खासियत यह है कि एक मेढ़ पर कृष्ण, काली, दुर्गा, महिषासुर, शिव पार्वती, गणेश जी, कार्तिक जी सहित तेरह मूर्तियाँ बनाई जाती हैं। शायद इस लिए ये शक्तिपीठ तिलडीहा के नाम से विख्यात हो गया। प्रथम पूजा के दिन यहाँ 108 विल्वपत्र (बेल के पत्ते)  से पूजा की जाती है। पुनः दो कोहडे की बलि दी जाती है। चतुर्थ पूजा मे पान के पत्ते और केला के वृक्ष से पूजन होता है। उसके बाद सातवीं पूजा को मंडप पे माता की प्रतिमा का श्रृंगार किया जाता है। यह पूजन हेतु रात्रि में पंडितजी और मेढ़पती द्वारा माँ के आँख की पुतली बनाई जाती हैं और रात्रि में ही मंदिर के मुख्य गेट पर दो काला पाठा रखा जाता हैं। जिससे कि सुबह पट खुलते ही सर्वप्रथम पाठा पर नज़र पड़े। यहाँ आज भी बलि प्रथा जागृत है। यहाँ अष्टमी और नवमी को बलि दी जाती है। 

तेलडीहा शक्तिपीठ की स्थापना
बंगाल के दो भाई जो भगवती के उपासक थे। उनमे एक हरवल्लव दास के द्वारा 1603 ई में बडुआ नदी के किनारे १०५ नरमुंड के उपर माता के मंदिर की स्थापना की गई। जहाँ पहले ये दोनों भाई हरवंशपुर के दक्षिणी भाग में शमशान हुआ करता था और ये लोग यही पे तांत्रिक विद्या से पूजा आहुति करते थे। इनके वंशज का आश्रय भी मंदिर प्रांगण मे ही है। 
मंदिर की बनावट
प्रारंभ में सिर्फ मंदिर था  वो भी पुरा कच्ची। समय के साथ विकाश कार्य होता चला गया। और आज चारो तरफ पक्की सड़क है। मंदिर भव्य है। सुंदर और आकर्षक घेराबंदी है। लेकिन एक सबसे खास बात की माता का गर्भ गृह/माता की पिंडी आज भी कच्ची ही है। मिट्टी की। लोगों की मान्यता है कि ये माता की इक्षा थी। और यही वजह से शायद आजतक कच्ची ही है। सेवा और भक्ति इसे भी देखें
तिलडीहा शक्तिपीठ कहाँ है
बाँका जिला के  शंभुगन्ज (shambhuganj)  प्रखंड में छत्रहार पंचायत के हरवंशपुर ग्राम में माँ दुर्गा का तिलडीहा शक्तिपीठ अवस्थित् है। जो बिहार में है। 
तिलडीहा शक्तिपीठ कैसे जाए (सफरनामा
1,, मुख्य रूप से दो रेलवे स्टेशन है पहला भागलपुर रेलवे स्टेशन यहाँ से सुलतानगंज फिर सुलतानगंज से तारापुर। यहाँ से महज  एक किलोमीटर की दूरी पर माता का शक्तिपीठ है। 2,, दूसरा जमालपुर रेलवे स्टेशन यहाँ से आप बरियारपुर से तारापुर। या जमालपुर से सुलतानगंज रेलवे स्टेशन से तारापुर। चुकी तारापुर बाजार में ही शक्तिपीठ तिलडीहा है। तारापुर मे रात्रि विश्राम भी किया जा सकता है। 
अन्य मान्यता (सुख दुःख और जिंदगी
ऐसे तो सभी दिन यहाँ पूजा पाठ होते रहता है। लेकिन सप्ताह में दो दिन विशेष रूप से पूजा का काफी महत्व है मंगलवार( tuesday) और शनिवार (saturday)  । नवरात्रि में तो पूजा होता ही है। लेकिन सावन के महीनों में भी भक्तजन सुलतानगंज से जल भरकर यहाँ इस शक्तिपीठ मे पूजा करते हैं। यहाँ सच्चे मन से माँगी गई मुरादे पूरी होती हैं। इस शक्तिपीठ के पूजा अर्चना का विशेष महत्व है। 
इस शक्तिपीठ तिलडीहा शक्तिपीठ के आस पास के कुछ जिला और गाँव-/ जिला-- जमुई, मुंगेर, भागलपुर, बाँका,,, कुछ गाँव- कुर्माडीह, बंशीपुर, हरवंशपुर,
तिलडीहा शक्तिपीठ के भौगोलिक स्थिति- ये तारापुर बाजार से लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर है। मंदिर के मुख्य गेट पर एक भव्य द्वार है। एक पुल है जो बडुआ नदी के उपर और शक्तिपीठ  के मुख्य द्वार पर है। ये शक्तिपीठ बडुआ नदी के किनारे है। जिसमे वर्ष भर पानी रहती है। मंदिर के चारो तरफ खेत खलिहान बड़े बड़े गाछ वृक्ष है। सावन मे यहाँ का प्राकृतिक दृश्य काफी मनोरम प्रतीत होता है। मंदिर प्रांगण मे एक कुआँ है। मान्यता है कि पहले इसके जल से हाथ पैर धो लिया जाता है। शारदीय नवरात्र में यहाँ बहुत बड़ा मेले का आयोजन होता है। लाखों की संख्या में भक्तजन आते हैं और हज़ारों की संख्या में पाठा की बलि होती है। संयुक्त परिवार और नज़रिया
कुछ सुनहरे यादें-- बचपन में कई बार इस शक्तिपीठ मे माता के दर्शन और पूजा पाठ को गया हूँ। हमे बहुत ज्यादा आस्था और श्रधा है। पहाड़पुर से हवेली खड़गपुर होते हुए लगभग 28 किलोमीटर की दूरी पर तारापुर मे ये शक्तिपीठ पीठ है। पास होने के कारण अक्सर जाता हूँ। 
Disclaimer-- उपर की जानकारी विभिन्न माध्यमो से संकलित है। कुछ खुद का अनुभव है। उम्मीद है पसंद आया होगा। 🙏queenrajthoughthindi.blogspot.com
Special request please read & forward. 

शनिवार, 15 अक्टूबर 2022

🙏महापर्व छठ🙏

          🙏 महापर्व छठ🙏

कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष के षष्ठी तिथि को मनाया जाने वाला महापर्व  छठ पूजा है। ऐसे सीधे तौर पर दिवाली के छः दिन बाद छठ पूजा (महापर्व छठ)होता है। पारिवारिक सुख समृद्धि व मनवांछित फल की प्राप्ति हेतु ये पर्व मनाया जाता है। स्त्री और पुरुष, बूढ़े जवान समान रूप से कर सकते है छठ पर्व। इसमें मुख्य रूप से अस्ताचलगामी सूर्य देव की पूजा उपासना संध्याकाल मे और उदीयमान सूर्य देव की पूजा उपासना प्रातःकालीन मे की जाती है। छठ पूजा बहुत विधि -विधान और श्रधा भाव से की जाती है। कुछ राज्य में इसका खास महत्व है। बिहार, झारखंड, बंगाल, ऐसे नेपाल में भी छठ पर्व होता है। छठ पर्व

दिवाली के बाद छठ घाटो की सफाई 

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दिवाली के बाद से ही छठ पर्व की तैयारी शुरू हो जाती हैं। जिसमे बांस के डाला, टोकरी, सूप ज्यादा प्रचलित है। इसकी खरीददारी की जाती है। उसके बाद छठ व्रत करने वाले लोग के लिए गंगा किनारे या नदी, पोखर के किनारे घाट बनाया जाता हैं। जिससे व्रत करने वाले लोग को पूजा उपासना मे कोई दिक्कत नहीं हो। क्युकी छठ पर्व मे पानी में खड़ा होके सूर्य देव की पूजा उपासना की जाती है। 

गंगा स्नान (नहायखाय) 

इस दिन व्रत करने वाले लोग (छठ पूजा करने वाले महिला/पुरुष) गंगा स्नान करके संकल्प लेते हैं। छठ पर्व करने का। स्नान के बाद गंगाजल घर लाते हैं जो आगे छठ पूजा मे काम आता है। 

कद्दू -भात बनाके खाना

इस दिन बहुत नियम विधान से कद्दू और चने की सब्जी, अरवा चावल का भात, और कई तरह की सब्जी वगैरह साग खाने की प्रथा है। और प्रसाद स्वरूप इससे आस पास पड़ोस में भिजवाया भी जाता हैं। 

खरना 

इस दिन जिसे खरना कहते हैं। इसमें व्रत करने वाले लोग निराहार /उपवास मे रहते हैं। खरना मे गाय के दूध से और अरवा चावल और गुड मिलाकर खीर पुडी बनाये जाते हैं। फिर शाम मे इनसभी को केले के पत्ते पर भोग लगाया जाता हैं। पूजा अर्चना की जाती है। फिर प्रसाद के रूप में इसको वितरित किया जाता है। ये प्रसाद भी घर घर बटवाया जाता है। इस पूजा मे आप अजीब सी शांति का अनुभव करोगे। क्युकी शोर- शराबा वर्जित है। पुरा शहर, गाँव या यू कहे पुरा वातावरण एकदम शांत हो जाता है। इसमें मुख्य रूप से मिट्टी का चूल्हा और आम की लकड़ी का उपयोग काफी महत्व रखता है। ऐसे नये साफ सुथरी चूल्हे पर भी अब बनाने लगे हैं लोग। प्रेम से बोले छठ मैया की जय 🙏

अस्ताचलगामी सूर्यदेव की पूजा सांध्यकालीन अर्घ्य या पहली अर्घ्य

इस वर्ष october month के अंतिम सप्ताह में छठ पर्व मनाया जाएगा। (३० October) |इस दिन षष्ठी तिथि है शाम मे संध्याकालीन पूजा होती हैं। सुबह से काफी चहल पहल रहती है। इसी दिन दिन में डाला, सूप वगैरह तैयार किया जाता है। पकवान,, फल, फूल, पूजन सlमग्री तैयार किया जाता है। शाम तीन बजे के लगभग डाला और व्रत करने वाले लोग अपने अपने घर से छठ घाट की ओर रवाना होने लगते हैं। घर की महिलाएं, बच्चे, बूढ़े सभी टोली बनाकर घाट पहुँच जाते हैं। छठ गीत गाया जाता है। छठ घाट पर छठ व्रत करने वाले लोग गंगा नदी में स्नान के बाद कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य देव की पूजा उपासना करते हैं। 
बारी -बारी से सभी डाला और सूप जो फल, फूल और पूजन सामग्री से सुसज्जित रहता है उसे सूर्य देव को चढ़ाते है। घाट किनारे बैठी महिलाएं छठ पूजा गीत गा रही होती हैं। छठ घाट को पूरी तरह से सजाया जाता है। धूप दीप प्रज्ज्वलित होते रहता है। अगरबती, कपूर , शुद्ध गाय के घी से वातावरण सुगंधित रहता है। पुरा माहौल भक्तिमय रहता है। 
छठ घाट पर बच्चे पटाखे, फुलझडी से आतिशबाजी करते हैं। फिर पुनः वापस घर आते हैं। रात्रि में सबलोग मिलजुल के रहते है। व्रत करने वाले लोग की सेवा की जाती है। वो भी श्रधा भाव से। जो काफी सौभाग्य और पुण्य की बात होती हैं। gets 50% off all items

प्रातः कालीन अर्घ्य दूसरी अर्घ्य

इस दिन उदीयमान सूर्य देव की पूजा आराधना की जाती है। ये अंतिम दिन होता है। पूजा के बाद व्रत करने वाले लोग के लिए अलाव वगैरह की इंतज़ाम किया जाता हैं। पानी से बाहर आने के बाद  इन्हे प्रणाम किया जाता है। जो शुभ फलदायी होता है। चुकी कार्तिक माह में कड़ाके की ठंढ पडती है। उगते सूर्य देव की पूजा के साथ ही लोग अपने अपने घर आते हैं। पहले डाला और सूप का प्रसाद पंडितजी को दिया जाता है। कुछ लोग गाय माता को भी खिलाते है।उसके बाद व्रत करने वाले लोग ग्रहण करती हैं। उसके बाद प्रसाद स्वरूप वितरित किया जाता है। पlरन के साथ ही छठ पूजा समाप्त हो जाता है। व्रत करने वाले लोग पहले हल्का गुनगुना दूध पीते हैं उसके बाद हल्का भोजन लेते हैं। फिर समान्य रूप से खाने पीने लगते हैं। (खुशी

छठ पूजा से जुडी पुरानी यादें😆सफरनामा

बात आज से लगभग बीस वर्ष पहले की है जब हमलोग बच्चे थे। हमारे नानी घर और दादीघर दोनों जगह छठ पूजा होती थी। दोनों जगह संयुक्त परिवार था। घर में फुआजी, पिताजी, चाचा जी, दादी जी एक साथ छठ करती थी। तो दूसरे ओर नानी जी। हमलोग सभी भाई बहन , मौसी, लोग एक साथ मिलते जुलते थे। छठ मे पुरा घर भरा पुरा था। हमलोग सभी छठ पूजा पूरे जोश, भक्ति, श्रधा भाव से मनाते थे। उस समय काफी ज्यादा ठंढ पडती थी। स्वेटर, शाल, टोपी के बाद भी ठंढ लगती थी। शायद वर्ष 1998 ई के आस पास। छठ पूजा में हमलोग सभी परिवार के लोग मामा, मौसा, हम, चचेरे  चचेरि भाई बहन सब पहली अर्घ्य के रात में एक साथ मिल बैठ के बातचीत, हँसी मज़ाक, खाना पीना किया करते थे। बहुत मन लगता था। जाने कहाँ गए वो दिन। 
--उपरोक्त जानकारी अपनी व्यक्तिगत पारिवारिक अनुभव पे आधारित है। तथा कुछ जानकारी अन्य माध्यम से संकलित है। ऐसे सबके अपने -अपने तरीके एवम विधि- विधान होता है। ये भी सच है। फिर भी अगर आप छठ पूजा करने की इच्छुक होते है तो श्रीमान पंडित जी से सलाह लेकर उसका अनुपालन करे। विश्वास है कि पढ़ कर अच्छा लगता होगा। तो please read&forward🙏

मंगलवार, 11 अक्टूबर 2022

खुशी और आकांक्षा

                      खुशी और आकांक्षा   

                   जीने की कला open & read

खुशी और आकांक्षा---


खुशी एक ऐसी भावना है जो हमें पूर्णतः आनंदित और संतुष्ट महसूस कराती है। यह हमें एक ऊँची और प्रफुल्लित भावना देती है जो हमें जीवन में सुख और समृद्धि का अनुभव करने में मदद करती है। खुशी एक ऐसी स्थिति होती है जो हमें जीवन में सफलता और संतुष्टि की अनुभूति कराती है।

आकांक्षा एक दृढ़ इच्छा होती है जो हमें एक उच्च लक्ष्य की ओर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है। यह हमें एक सकारात्मक भावना देती है जो हमें अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए प्रेरित करती है। आकांक्षा एक ऐसी शक्ति है जो हमें जीवन में उच्चतम स्तर तक पहुंचने में मदद करती है। यह हमें अपनी क्षमताओं का परिचय कराती है और हमें अपने अधिकारों को पहचानने में मदद करती है।

आकांक्षा के साथ नियंत्रण हो तभी खुशी संभव है। नही तो जिंदगी भर छाँव की तलाश मे धूप से गुज़रना पड़ेगा। खुशी के लिए दिखावा नहीं करके संतुलित और संयमित जीवन जीना होगा मूलभूत सुविधाएं भी नही मिले तो खुशी मज़ाक लगती हैं। लेकिन एक सच्चाई ये भी है कि मनुष्य एक समाज़िक् प्राणी है और परिवार से समाज़ बनता है। फिर परिवार तो कई सदस्यों का समूह है। और सभी का सोच, विचार, व्यवहार, आपसे मिले बिल्कुल जरूरी नही जबकी मॉडर्न युग है दिखावा का दौर है। एक ओर जहाँ आपने समझ से काम लिया, संतुलित रहे, दिखावा नहीं किया वही दूसरी ओर खुले आम प्रदर्शन हो रहा है। जरूरत और आकांक्षा के आगे रिश्ते कमज़ोर और बेबस नजर आ रही हैं। सकारात्मक और नकारात्मक ये भी जानेएक छोटा सा उदाहरण- आपके घर में चार बच्चे है। माता- पिता है। एक छोटा भाई और एक बहन शादी के लिए है। और निम्न आय की नौकरी और आमदनी है। संतुलित खर्च है। बाजार से कोई समान लिए चॉकलेट, मिठाई थोड़ा सा। घर में कम पड़ गया। क्या करोगे। जरूरत और आकांक्षा रिश्ते पर भारी पड़ता नज़र आ रहा है। समझ रहे हो। हो गया। उपर बोल चुका हूँ परिवार है सोच अलग, व्यवहार अलग। यही है मजबूरी।जब एक माँ बाप की परवरिश मे उतार चढ़ाव होता है तो आप अंदाज़ा लगा लो। खामोशी से बहुत कुछ झेलना पड़ता है। ये मेरा व्यक्तिगत राय और विचार है। फिर भी स्वाभिमान का अलग और सर्वोच्च स्थान है। जो गरिमामयी है। फिर भी हमलोग रमता योगी बहता पानी है साहब। जब जैसा तब तैसा। कोई घमंड नहीं।    कुछ हद तक आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होना भी घरेलू  हिंसा का कारण है।    और आगे पढ़े meaning of hello                                        जरूरत और आकांक्षा

अब दूसरी तरफ एक कस्बे में एक छोटा निम्न आय प्राप्त परिवार रहता था। आधुनिकीकरण से दूर। प्यार भरी जीवन व्यतीत हो रही थी। सभी आपस में मिलजुल के प्रेम भाव से रह रहे थे। बीबी बच्चा और खुद कुल दो जने खुद दो बच्चे कुल चार सदस्य। यहाँ पर भी जरूरत थी आकांक्षा थी पर प्रेम और रिश्ते सर्वोपरि था। इनको शादी में आमंत्रित किया गया गाँव से दूर शहर में। घर के मुखिया ने जरूरत और हैसियत के हिसाब से अच्छी खासी खरीददारी की। इस महीने का खर्च इनके मुताबिक ज्यादा था। फिर भी परिवार के लिए सब ठीक है यही सोच के साथ। नियत समय पर घर के मुखिया (अभिभावक) अपने परिवार के साथ शादी घर में पहुँच जाते है। शुरुआत में आवाओ भगत सम्मान होता है। धीरे धीरे सारे लोग आने लगते है।चुकी ये लोग का पेहनlवा ओढावा साधारण थी। आय सीमित थी। वही कुछ रिश्तेदार खुलकर प्रदर्शन कर रहे थे। एक दिन शाम को घर की महिलाएं शादी गीत गा रही थी नृत्य हो रहा था। हँसी मज़ाक चल रहा था। दूसरी ओर एक सज्जन महिला इनके पत्नी को बोल पडी। आपकी साड़ी पुराना style की है। कुछ नया लेना था जो अभी चला है। तुम्हारे पास अपना मोबाइल नही है। गहने है कि कम है। कैसे रहती हो। गाडी घर में है। और भी बहुत तरह के तंज कसे गए। तत्काल तो उसने हंसकर बात टाल दिया लेकिन इस बात को वो अपने दिल और दिमाग से निकाल नही पाई। रात भर करवटें बदलते रही। अगले दिन से मायूस रहने लगी। शादी हुई ये लोग वापस गाँव आये।    मोटापा कम करने का अचुक उपाय                                                                रिश्ते की हार

लेकिन इनकी पत्नी की सब्र की बांध टूट गई और उन्होंने एक रात बोल दिया। ए जी एक बात बोलू पति बोले क्या /पत्नी बोली आखिर कब तक हमलोग ऐसे मन मारकर, संतोषी जीवन जीयेंगे। मै अब औरो की तरह खुलकर जीना चाहती हूँ। और अपनी सारी मांगे श्रीमान जी के सामने रख दी। अचानक प्यार भरा माहौल शांत दोनों चुप क्या बोले क्या नही कुछ नही समझ आ रहा। तत्काल दोनों करवटें बदलते सो गए। लेकिन दूसरे दिन से लगातार श्रीमती जी उदास मायूस रहने लगी। घर का माहौल ही बदल गया। प्रेम, रिश्ता, कद्र पर जरूरत की मार भारी पड़ गई। आकांक्षा, शौक, जरूरत, दिखावा ने घर के माहौल को पूरी तरह से बदल दिया। क्या यही प्यार है। खुशी क्या है। कब मिलती है खुशी। और अंततः श्रीमान जी को भविष्य की चिंता छोड़ सारी मांगे मानने पड़े। ये बात सही साबित हो रही है कि नही की गरीबी मे भी खुशी है अगर दिखावा नही हो और आकांक्षा पे पूर्ण नियंत्रण हो तब। वक़्त की नजाकत को समझे और जिंदगी जीये

निष्कर्ष--वर्षा का सही आनंद वही लोग को नसीब है। जिनके पास पैसा है। पहनने को कपड़ा, रहने को घर, चलने को व्यक्तिगत गाड़ी हो घर में अनाज हो। वर्षा मे गर्म प्याज और आलू के पकोडा और गर्मा गर्म चाय। डीलक्स बंगलो मे dinningroom मे बड़ा सा led TV 📺 /हाथ में android phone हो। और घर के आगे पीछे नौकर चाकर् हो। खुशी भरे जेब पूरी जरूरत से होते है। जिंदगी में अपवाद भी होते है। सोचने की शक्ति से जीवन जागृत

वही दूसरी ओर समाज़ के कुछ लोग ऐसे भी है जिन्हे किसी कारण बस खाना नसीब नहीं। रहने को घर नही। खपडे का झोपडी नुमा घर। और फर्श मिट्टी का, हवा के साथ तेज वर्षा, झोपडी से टपकता वर्षा की बुँदे और गीला भींगा फर्श। खाली जेब, फटे कपड़े, भूखे बच्चे, परेशान पत्नी और काली अंधेरी रात। घर में राशन नही। बाबूजी बेबस बीमार। कल्पना मात्र से रूह काँप जाती है। दिल घबराता है। मन रो देता है। उफ़ हे प्रभु ये कैसी बेबसी कैसी विडंबना। इन गुमनाम जिंदगी में वर्षा और ठंढ का मौसम खुशी देगी क्या।। क्या यही है जीवन। आज के लिए इतना ही इसके आगे तत्काल लिखने की हिम्मत नहीं। मन उदास हो गया। 

*आकांक्षा और ईमानदारी दो बहुत ही अलग-अलग गुण हैं।*

आकांक्षा व्यक्ति की उत्कृष्टता तक पहुंचने की इच्छा होती है। इसका मतलब होता है कि वह जीवन में अधिकतम संभावनाओं को खोजता है और संभवतः सब कुछ हासिल करने के लिए प्रयास करता है। इसके लिए वह अपने लक्ष्यों और उद्देश्यों के प्रति बहुत उत्साही होता है और किसी भी मानवाधिकारों को तोड़ने से घबराता नहीं है।

दूसरी ओर, ईमानदारी व्यक्ति की शुद्धता और सच्चाई के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाती है। वह सत्य का पालन करता है और दूसरों के अधिकारों को समझता है। ईमानदारी सबसे ज्यादा मूल्यवान गुणों में से एक है, क्योंकि यह विश्वास का मुद्दा होता है। जिस व्यक्ति में ईमानदारी की गुणवत्ता होती है, वह अपने वचनों का पालन करता है और दूसरों के साथ एक निष्ठावान संबंध बनाता है।

इन दो गुणों का संयोग समझदार, सफल और उत्कृष्ट व्यक्ति के लिए बेहद जरूर है।

 Disclaimer-- मेरे ब्लॉग खुद के अनुभव और कुछ अन्य माध्यम से संकलित किया गया है। उद्देश्य मात्र आपसे जानकारी साझा करना। विशेष रूप से पालन के लिए expert से सलाह ले


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जब नींद और दर्द हार गई जिम्मेदारी जीत गई

अभी रात के एक बज रहे हैं। मैं भागलपुर स्थित अपने घर के रूम में सो रहा था।एक सेलिंग दूसरा स्टैंड फैन चल रहा था।नींद बहुत अच्छी लग रही थी। कल ...